सारनाथ

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तीसरी सदी ईसा पूर्व का, अशोक का बनवाया "धम्मेक स्तूप", सारनाथ में

सारनाथ भारतीय राज्य उत्तर प्रदेश के पूर्वी भाग में स्थित वाराणसी (बनारस) के पास एक गाँव है। यह बनारस से लगभग 13 किलोमीटर की दूरी पर उत्तर-उत्तर पूर्व दिशा में है। यह स्थान बौद्ध और जैन धर्म के तीर्थ यात्रियों के लिए महत्वपूर्ण है। गौतम बुद्ध ने अपना पहला धर्मोपदेश यही दिया था। इस उपदेश को धर्मचक्रप्रवर्तन कहा जाता है, इसके बाद संघ की स्थापना यहीं हुयी थी और इसीलिए यह बौद्ध धर्म के चार सबसे प्रमुख तीर्थों में से एक है। यहाँ के बौद्ध मठ ध्यान करने के लिये उत्तम स्थल हैं।

हिरन पार्क के परिसर में सम्राट अशोक द्वारा बनवाया हुआ 249 ईसा पूर्व का धम्मेक स्तूप है, साथ ही तीसरी से ग्यारहवीं सदी के बीच के बनवाये हुए अन्य स्थापत्य भी हैं। यह बनारस के उपनगर के रूप में विकसित हो रहा है और जो पर्यटक बनारस की भीड़-भाड़ से दूर खुले हरे-भरे वातावरण में कुछ समय बिताना चाहते हैं उनके लिए अच्छा अवसर उपलब्ध कराता है।


पहुँचें[सम्पादन]

सारनाथ का नक्शा

हवाई जहाज से[सम्पादन]

  • वाराणसी हवाई अड्डा (लालबहादुर शास्त्री हवाई अड्डा, बाबतपुर) यहाँ से सबसे नजदीकी हवाई अड्डा है, जो सारनाथ से 24 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। दिल्ली, कोलकाता और मुम्बई जैसे नगरों से यहाँ के लिए रोज़ाना हवाई जहाजें उपलब्ध हैं। कुछ अंतर्राष्ट्रीय उड़ाने भी यहाँ उतरती हैं। सबसे अच्छी बात यह है कि आपको यहाँ उतरने के बाद मुख्य शहर बनारस नहीं जाना पड़ता क्योंकि बनारस से बाबतपुर हवाईअड्डा और सारनाथ दोनों ही जगहें लगभग एक ही दिशा में हैं और हवाईअड्डे से आप सीधे सारनाथ पहुँच सकते हैं।

रेलगाड़ी से[सम्पादन]

नज़दीकी बड़ा रेलवे स्टेशन वाराणसी कैन्ट है (6 कि॰मी॰), जो सभी बड़े भारतीय शहरों से जुड़ा है। सारनाथ में खुद भी एक छोटा स्टेशन है जहाँ के लिए वाराणसी कैन्ट स्टेशन से हर दो तीन घंटे के लिए रेलगाड़ी मिल जाती है, परन्तु यह स्टेशन वाराणसी-गोरखपुर और वाराणसी-बलिया मार्ग पर पड़ता है और कुछ ही एक्सप्रेस रेलगाड़ियाँ यहाँ रुकती हैं। हाँ, उपरोक्त दोनों रेलमार्गों की ज्यादातर गाड़ियों का अंतिम पड़ाव वाराणसी सिटी स्टेशन होता है जो सारनाथ और वाराणसी कैन्ट के बीच में स्थित है, अतः वाराणसी सिटी स्टेशन से भी सारनाथ आसानी से पहुँचा जा सकता है।

  • 1 वाराणसी कैंट (IR स्टेशन कोड: BSB) यह वाराणसी का सबसे व्यस्त स्टेशन है। यहाँ स्टेशन के बाहर निकल कर आप आसानी से सारनाथ जाने के लिए ऑटो रिक्शा ले सकते हैं; टुकटुक ऑटो रिक्शा लगभग ₹150 किराया लेते हैं। वाराणसी जंक्शन रेलवे स्टेशन को विकिपीडिया में देखें Q3544938 को विकिडाटा में देखें
  • वाराणसी सिटी यह दूसरा स्टेशन है और गोरखपुर, गाजीपुर इत्यादि के ओर से आने वाली रेलगाड़ियाँ यहाँ रुकती हैं और उनके लिए यह बनारस कैंट स्टेशन से ठीक पहले पड़ता है। ऑटो रिक्शा लगभग ₹100 किराया लेते हैं। वाराणसी सिटी रेलवे स्टेशन को विकिपीडिया में देखें
  • सारनाथ रेलवे स्टेशन सारनाथ में भी एक छोटा किंतु सुंदर और साफसुथरा स्टेशन है जहाँ गोरखपुर, गाजीपुर इत्यादि के ओर से आने वाली कुछ रेलगाड़ियाँ रुकती हैं। यह बनारस सिटी स्टेशन से ठीक पहले पड़ता है। यहाँ से आप पैदल टहलते हुए मुख्य बौद्ध मंदिर तक जा सकते हैं। सारनाथ रेलवे स्टेशन को विकिपीडिया में देखें

बस से[सम्पादन]

लम्बी दूरी की बसें वाराणसी कैंट बस अड्डे तक पहुँचती हैं। यहाँ से आप नगरीय परिवहन की बस, टैक्सी अथवा ऑटो रिक्शा द्वारा सारनाथ पहुँच सकते हैं।

टैक्सी/ऑटो रिक्शा से[सम्पादन]

बनारस से टैक्सी और ऑटो रिक्शा द्वारा यहाँ आसानी से पहुँचा जा सकता है। अगर आप भारत से बाहर के हैं, बनारस से यहाँ पहुँचने के लिए पहले कोई दाम न तय करें। आप पहुंच कर पैसे देंने के बारे में बात कर सकते हैं। अगर आपके पास सामन बहुत अधिक है तो टैक्सी करें, नहीं तो ऑटो रिक्शा बेहतर होगा। अगर सामान बहुत कम है और आप बस में सफ़र कर सकते तो लोकल परिवहन कि बीएस पकड़ कर बनारस कैंट से सारनाथ जाना सबसे बेहतर चुनाव होगा। यहाँ की स्थानीय भाषा पश्चिमी भोजपुरी है, इसका ज्ञान आपको किराए में बारगेन करने में काफ़ी लाभ दे सकता है।

देखें[सम्पादन]

श्री दिगंबर जैन मंदिर
  • अशोक स्तंभ तुर्की आक्रमण के दौरान यह टूट गया था और उस मूल स्थान पर केवल आधार ही बचा है, टूटा हुआ हिस्सा अब सारनाथ संग्रहालय में प्रदर्शन हेतु रखा गया है। इसमें चारों ओर एक दौरे की ओर पीठ किए शेर खड़े हैं। इसे 1950 में भारत के राष्ट्रीय चिन्ह के रूप में स्वीकार किया गया था। पहले इसके ऊपर एक बड़ा सा चक्र भी रखा हुआ रहा होगा परन्तु अब उस चक्र के कुछ टुकड़े ही मौजूद हैं जिन्हें संग्रहालय में पूरे चक्र के कल्पित चित्र के साथ मिला कर रखा गया है ताकि देखकर अंदाजा हो सके कि यह चक्र अपने मूल रूप में कैसा रहा होगा।
  • 1 चौखंडी स्तूपऋषिपत्तन मार्ग पाँचवीं शताब्दी में इसे बनाया गया था। यदि आप बनारस से सारनाथ जाते हैं तो सबसे पहले आपको यही स्तूप दीखता है जो सड़क के बायीं ओर है। स्तूप एक बड़े से चबूतरे पर है और यह तीन स्तरों या मंजिलों में बना हुआ है। इसके सबसे नीचे के चबूतरों के आलों में बुद्ध मूर्तियाँ हैं। सबसे ऊपरी भाग में मुग़ल काल में बनायी गयी एक अष्टकोणीय छतरी बनी हुई है जो नीचे की संरचना से मेल नहीं खाती। जयशंकर प्रसाद की प्रसिद्ध हिंदी कहानी "ममता" इसी छतरी की कथा के आधार बार लिखी गयी है। स्तूप का संरक्षण भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग द्वारा किया जाता है। संरक्षण कि स्थिति अच्छी है। स्तूप के परिसर के उत्तरी भाग में बाग़ भी है जहाँ कुछ देर विश्राम किया जा सकता है।
  • 2 धमेख स्तूप इसे वर्ष -249 में सम्राट अशोक ने बनाया था।
  • मूलगन्धकुटी विहार - ये वही टूटा मंदिर है, जिस जगह है, जहाँ बुद्ध ने अपनी पहली वर्षा ऋतु देखी थी।
  • सारनाथ संग्रालय - यह बहुत छोटा संग्रह है, लेकिन बहुत खास चीजों को ही यहाँ रखा गया है। यह सुबह 9 बजे से शाम 5 बजे तक ही खुला रहता है और शुक्रवार को बंद रहता है।
  • श्री दिगंबर जैन मंदिर - धमेख स्तूप के पास ही यह मंदिर स्थित है। यहाँ आप मुख्य सड़क से आ सकते हैं, जो धमेख स्तूप तक भी जाता है।
  • यहाँ आपको थाई मंदिर, जापानी मंदिर, चीनी मंदिर, बर्मा मंदिर, इंडोनेशिया मंदिर आदि भी मिलेंगे।

सोना[सम्पादन]

  • जैन पेइंग गेस्ट हाउस - बहुत ही सस्ता है और परिवार जैसा आतिथ्य भी किया जाता है। इसके लिए आपको ₹300 हर रात के लिए देने होंगे। जिसमें हो सकता है कि आपको परिवार के साथ ही यहाँ सुबह शाम और रात का भोजन भी करने दे दिया जाये।