गुजरात की सीमा पर स्थित मानगढ़ की पहाड़ी

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दिल्ली आजतक AajTak Hindi News LiveTv search Hindi News/इंडिया टुडे/खास रपट ADVERTISEMENT

Next मानगढ़ जनसंहार: इतिहास में दफन सबसे बड़ी कुर्बानी एक जलियांवाला बाग गुजरात में भी है. राजस्थान और गुजरात की सीमा पर स्थित मानगढ़ की पहाड़ी पर अंग्रेजों ने 17 नवंबर, 1913 को 1,500 से ज्यादा भीलों को मौत के घाट उतार दिया था. मारे गए भीलों के वंशजों से इंडिया टुडे ने विशेष बातचीत की. मानगढ़ जनसंहार: इतिहास में दफन सबसे बड़ी कुर्बानी

उदय माहूरकर अहमदाबाद, 04 September 2012

राजस्थान-गुजरात की सीमा पर अरावली पर्वत श्रंखला में दफन है करीब एक सदी पहले 17 नवंबर, 1913 को अंजाम दिया गया एक बर्बर आदिवासी नरसंहार. इंडिया टुडे ने बांसवाड़ा, पंचमहाल, डूंगरपुर जिलों के क्षेत्र में बसे भील गांवों में जाकर और मौखिक इतिहास तथा अकादमिक शोध के पन्नों को पलट कर एक ऐसी अपरिचित त्रासदी का पर्दाफाश किया है जो 13 अप्रैल, 1919 को पंजाब में हुए जलियांवाला बाग नरसंहार से मेल खाती है जिसमें अंग्रेज जनरल डायर के आदेश पर पुलिस ने 379 लोगों को गोलियों से भून डाला था. हालांकि राष्ट्रवादी इतिहासकारों की मानें तो इसमें मारे गए लोगों की संख्या 1,000 से ज्यादा थी.

भीलों के मौखिक इतिहास पर भरोसा करें तो मानगढ़ टेकरी पर अंग्रेजी फौज ने आदिवासी नेता और सुधारक गोविंद गुरु के 1,500 समर्थकों को गोलियों से भून दिया था. राजस्थान के डूंगरपुर के पास स्थित वेदसा गांव के निवासी गोविंद गुरु बंजारा समुदाय से थे. उन्होंने 19वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में भीलों के बीच उनके सशक्तीकरण के लिए 'भगत आंदोलन' चलाया था, जिसके तहत भीलों को शाकाहार अपनाना था और हर किस्म के मादक पदार्थों से दूर रहना था.

गुरु से प्रेरित होकर भीलों ने अंग्रेजों की दमनकारी नीतियों का विरोध किया और वे बांसवाड़ा, संतरामपुर, डूंगरपुर और कुशलगढ़ के रजवाड़ों द्वारा जबरन करवाई जाने वाली बंधुआ मजदूरी के खिलाफ उठ खड़े हुए.

उस नरसंहार में मारे गए लोगों के वंशज आज भी उस दिन को याद कर के विभिन्न घटनाओं को गिनवाते हैं. मारे गए लोगों में मगन हीरा पारघी के दादा धारजी भी थे. बांसवाड़ा के अमालिया गांव के रहने वाले 75 वर्षीय मगन बताते हैं, "मेरे पिता हीरा का दशकभर पहले निधन हो गया था, वे बताते थे कि जब भीलों ने टेकरी खाली करने से मना कर दिया और अंग्रेज उन्हें इसके लिए मना नहीं पाए तो गोलीबारी शुरू हो गई.

इस बर्बर गोलीबारी को एक अंग्रेज अफसर ने तब रोका जब उसने देखा कि मारी गई भील महिला का बच्चा उससे चिपट कर स्तनपान कर रहा था." बांसवाड़ा के ही खूटा टिकमा गांव के 86 वर्षीय वीरजी पारघी बताते हैं कि उनके पिता सोमा 1913 की उस गोलीबारी में बच गए थे. उनकी मौत सन् 2000 में 110 वर्ष की उम्र में हुई. वे बताते थे कि अंग्रेजों ने खच्चरों के ऊपर 'तोप जैसी बंदूकें' लाद दी थीं और उन्हें वे गोले में दौड़ाते थे तथा गोलियां चलती जाती थीं, ताकि ज्यादा-से-ज्यादा लोगों को मारा जा सके.

खुशकिस्मत सोमा बचकर निकल गए और घर लौटने से पहले कई दिन तक एक गुफा में छिपे रहे. वीरजी बताते हैं, " वे बताते थे कि सैकड़ों लोग गोलियों का शिकार हुए और जिन्होंने भागने की कोशिश की, वे पहाड़ी से गिर कर मारे गए." 58 वर्षीय भानजी रंगजी गरासिया के दादा गाला कचरा को भी अंग्रेजों की गोली लगी थी. बांसवाड़ा में भोंगापुरा गांव के भानजी बताते हैं, "मेरे पिता रंगजी उस समय सिर्फ 11 वर्ष के थे.

1991 में अपनी मौत तक वे अकसर यह किस्सा सुनाते थे कि उस दिन 1,500 भील मारे गए थे." उन्हीं के गांव के रहने वाले 69 वर्षीय मत्था जिठड़ा गरासिया के दादा वार सिंह गरासिया और उनकी चाची की उस गोलीबारी में मौत हो गई थी. माथा बताते हैं, "इस हत्याकांड से इतना खौफ फैल गया कि आजादी के कई दशक बाद तक भील मानगढ़ जाने से कतराते थे."

बांसवाड़ा के तेमरवा गांव के 66 वर्षीय भील किसान लालशंकर पारघी इस इतिहास के टुकड़ों को जुटाने के लिए गांव-गांव जा चुके हैं. उनके दादा तीहा भी, जो गोविंद गुरु के सहयोगी थे, इसमें मारे गए थे. भगत आंदोलन को मजबूती देने के लिए गुरु ने संफ सभा नाम का एक सामाजिक-धार्मिक संगठन बनाया था. गांव-गांव में इसकी इकाइयां स्थापित करने में तीहा का खास योगदान था.

लालशंकर ने अब तक करीब ऐसे 250 परिवारों से घटना की मौखिक जानकारी जुटाई है जिनके परिजन मानगढ़ टेकरी पर मारे गए थे. तीहा के पार्थिव शरीर को गोलीबारी में बच गए छह भील गांव लेकर आए थे. उन्हें पास के ही जंगल में दफना दिया गया था. बाद में लालशंकर के पिता पोंगर ने यहां एक स्मारक बनवा दिया और नाम दिया 'जगमंदिर सत का चोपड़ा' (जगमंदिर, सच्चे इतिहास का स्थान).

ऐतिहासिक शोध भी भीलों के इस मौखिक इतिहास की पुष्टि करता है. गुजरात यूनिवर्सिटी में इतिहास पढ़ाने वाले 43 वर्षीय अरुण वाघेला बताते हैं कि गोविंद गुरु ने भीलों के बीच अपना आंदोलन 1890 के दशक में शुरू किया था. आंदोलन में अग्नि देवता को प्रतीक माना गया था. अनुयायियों को पवित्र अग्नि के समक्ष खड़े होकर पूजा के साथ-साथ हवन (यानी धूनी) करना होता था.

गुरु ने 1903 में अपनी धूनी मानगढ़ टेकरी पर जमाई. उनके आह्वान पर भीलों ने 1910 तक अंग्रेजों के सामने अपनी 33 मांगें रखीं, जिनमें मुख्य मांगें अंग्रेजों और स्थानीय रजवाड़ों द्वारा करवाई जाने वाली बंधुआ मजदूरी, लगाए जाने वाले भारी लगान और गुरु के अनुयायियों के उत्पीडऩ से जुड़ी थीं. लालशंकर बताते हैं, "जब अंग्रेजों और रजवाड़ों ने ये मांगें मानने से इनकार कर दिया और वे भगत आंदोलन को तोडऩे में लग गए तो गोविंद गुरु के नेतृत्व में भीलों के संघर्ष ने निर्णायक मोड़ ले लिया."

साकजीभाई दामोर के दादा एक दशक तक गुरु के सहयोगी रहे थे. वे गुजरात के पंचमहाल जिले के गराडु गांव के रहने वाले थे. वे भी मानगढ़ में मारे गए. 62 वर्षीय दामोर कहते हैं, "मेरे पिता गेंदरभाई बताया करते थे कि मांगें ठुकराए जाने के बाद, खासकर मुफ्त में बंधुआ मजदूरी की व्यवस्था को खत्म न किए जाने के कारण नरसंहार से एक माह पहले हजारों भीलों ने मानगढ़ पहाड़ी पर कब्जा कर लिया था और अंग्रेजों से अपनी आजादी का ऐलान करने की कसम खाई थी.

अंग्रेजों ने आखिरी चाल चलते हुए सालाना जुताई के लिए सवा रुपये की पेशकश की, लेकिन भीलों ने इसे सिरे से खारिज कर दिया." साकजीभाई अपने पिता द्वारा गाया जाने वाला भील क्रांतिकारी गीत याद करते हुए गुनगुनाते हैं, "ओ भुरेतिया नइ मानु रे, नइ मानु' (ओ अंग्रेजों, हम नहीं झुकेंगे तुम्हारे सामने).

वाघेला कहते हैं कि अंग्रेजों को भड़काने वाली सबसे पहली कार्रवाई मानगढ़ के करीब संतरामपुर के थाने पर हमले के रूप में सामने आई जिसे गुरु के दाएं हाथ पुंजा धिरजी पारघी और उनके समर्थकों ने अंजाम दिया. इसमें इंस्पेक्टर गुल मोहम्मद की मौत हो गई थी. इस घटना के बाद बांसवाड़ा, संतरामपुर, डूंगरपुर और कुशलगढ़ की रियासतों में गुरु और उनके समर्थकों का जोर बढ़ता ही गया, जिससे अंग्रेजों और स्थानीय रजवाड़ों को लगने लगा कि इस आंदोलन को अब कुचलना ही होगा. भीलों को मानगढ़ खाली करने की आखिरी चेतावनी दी गई जिसकी समय सीमा 15 नवंबर, 1913 थी, लेकिन उन्होंने इनकार कर दिया.

लालशंकर कहते हैं, "भीलों ने मानगढ़ हिल को किले में तब्दील कर दिया था जिसके भीतर देसी तमंचे और तलवारें जमा थीं." भानजी रंगजी गरासिया कहते हैं, "उन्होंने अंग्रेज फौजों का सामना किया क्योंकि उन्हें गोविंद गुरु की अध्यात्मिक ताकत पर पूरा भरोसा था.

उन्हें लगता था कि गुरु की शक्ति गोलियों को ततैयों में बदल देगी." तीन अंग्रेज अफसरों की अगुआई में मेवाड़ भील कोर और रजवाड़ों की अपनी सेना ने संयुक्त रूप से मानगढ़ को घेर लिया और भीलों को छिटकाने के लिए हवा में गोलीबारी की जाने लगी, जिसने बाद में बर्बर नरसंहार की शक्ल अख्तियार कर ली."

गुजरात वन विभाग ने हाल ही में एक किताब प्रकाशित की है गोविंद गुरुरू द चीफ ऐक्टर ऑफ द मानगढ़ रेवॉल्यूशन. इसमें लिखा गया है, "हमले में इस्तेमाल की जाने वाली मशीनगन और तोपों को खच्चरों और गधों पर लादकर मानगढ़ और पास की दूसरी पहाडिय़ों पर लाया गया था जिसकी कमान अंग्रेज अफसरों मेजर एस. बेली और कैप्टन ई. स्टॉइली के हाथ में थी." इस पुस्तक के लिए शोध कार्य को संचालित करने वाले प्रधान सचिव एस.के. नंदा कहते हैं, "हमने इस किताब को तैयार करने के लिए अफसरों, इतिहासकारों और नए शोधार्थियों का सहारा लिया."

इस हमले को अंजाम देने में इस इलाके के फिरंगी एजेंट आर.ई. हैमिल्टन का भी बड़ा हाथ रहा. अमेरिका की यूनिवर्सिटी ऑफ मिनेसोटा की शोधार्थी रीमा हूजा अपनी पुस्तक अ हिस्ट्री ऑफ राजस्थान में 14 फरवरी, 1914 को उत्तरी डिविजन के तत्कालीन कमिश्नर आर.पी. बैरो की रिपोर्ट के हवाले से कहती हैं, "कई भील मारे गए, जख्मी हुए और करीब 900 को जिंदा पकड़ लिया गया, जो गोलीबारी के बावजूद मानगढ़ हिल खाली करने को तैयार नहीं थे."

गोविंद गुरु को पकड़ लिया गया, उन पर मुकदमा चला और उन्हें आजीवन कारावास में भेज दिया गया. उनकी लोकप्रियता और अच्छे व्यवहार के चलते 1919 में उन्हें हैदराबाद जेल से रिहा कर दिया गया लेकिन उन रियासतों में उनके प्रवेश पर प्रतिबंध लगा दिया गया जहां उनके समर्थक थे.

वे गुजरात के लिंबडी के पास कंबोई में बस गए और 1931 में उनका निधन हो गया. आज भी कंबोई में गोविंद गुरु समाधि मंदिर में उनके अनुयायी श्रद्धा सुमन अर्पित करने आते हैं. उनके सहयोगी पुंजा धीरजी को आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई और काला पानी भेज दिया गया. इसके कई साल बाद उनके निधन का पता चला.

हूजा और वाघेला जिन सरकारी रिकॉर्डों का उल्लेख करते हैं, उनसे भीलों के बीच प्रचलित कुछ बातों की पुष्टि होती है, चाहे वह खच्चरों की पीठ पर तोप लादकर ले जाने वाली बात हो जैसा कि वीरजी पारघी ने बताया या फिर साकजीभाई द्वारा मानगढ़ हिल पर भीलों के कब्जे का दिया गया विवरण.

गोविंद गुरु और मानगढ़ हत्याकांड भीलों की स्मृति का हिस्सा बन चुके हैं. बावजूद इसके राजस्थान और गुजरात की सीमा पर बसे बांसवाड़ा-पंचमहाल के सुदूर अंचल में दफन यह ऐतिहासिक त्रासदी भारत की आजादी की लड़ाई के इतिहास में एक फुटनोट से ज्यादा की जगह नहीं पाती. वाघेला कहते हैं, "सरकार को न सिर्फ मानगढ़ नरसंहार पर बल्कि औपनिवेशिक सत्ता के खिलाफ उभरे ऐसे ही आदिवासी संघर्षों पर बड़े अनुसंधान के लिए अनुदान देना चाहिए. आदिवासियों के जलियांवाला बाग हत्याकांड के साथ ऐसा सौतेला व्यवहार क्यों?"

इत्तेफाक है कि इंडिया टुडे ने ही उत्तरी गुजरात के विजयनगर के पास पाल-चितरिया में अंग्रेजों द्वारा 1922 में किए गए 1,200 आदिवासियों के नरसंहार पर से 1997 में परदा उठाया था.

हालांकि उम्मीदें पूरी तरह से दफन नहीं “ई हैं. गुजरात सरकार ने 31 जुलाई को ऐलान किया कि वह 2013 में अंग्रेजों के खिलाफ आदिवासियों की शहादत के सौ साल मनाएगी. मानगढ़ हिल पर गोविंद गुरु के नाम पर बोटेनिकल गार्डन का उद्घाटन करने आए गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुरु के प्रपौत्र मान सिंह को सम्मानित भी किया. उद्घाटन समाहरोह में 80,000 से ज्यादा भीलों ने हिस्सा लिया. भीलों के इतिहास के इस त्रासद पन्ने पर आखिरकार सरकार का ध्यान चला ही गया.